
Kerala केरल: देश के कई स्कूलों में मिड-डे मील योजना गंभीर संकट का सामना कर रही है, क्योंकि लगातार बढ़ती महंगाई और कुकिंग गैस की कमी ने भोजन तैयार करने की लागत को काफी बढ़ा दिया है। स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों के लिए रोजाना भोजन तैयार करना बन गया है।
जानकारी के अनुसार, जब गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद हुए थे, उस समय नॉन-डोमेस्टिक गैस सिलेंडर की कीमत 1883 रुपये थी, जो अब बढ़कर 3113 रुपये तक पहुंच गई है। कीमतों में इस तेज वृद्धि ने स्कूलों के मासिक बजट पर भारी दबाव डाल दिया है।
अनुमान के मुताबिक, लगभग 1000 छात्रों वाले एक स्कूल को हर सप्ताह करीब पांच कुकिंग गैस सिलेंडरों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में केवल गैस का साप्ताहिक खर्च ही 15,000 रुपये से अधिक हो जाता है, जो कई स्कूलों के लिए संभालना मुश्किल साबित हो रहा है।
शिक्षकों का कहना है कि इसके साथ ही चावल, दाल और सब्जियों जैसी खाद्य सामग्री की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे मिड-डे मील योजना का संचालन और भी कठिन हो गया है। कई स्कूलों में बजट सीमित होने के कारण अतिरिक्त खर्च उठाना संभव नहीं रह गया है।
कुछ स्कूलों में जहां छात्रों की संख्या कम है, वहां 14.2 किलोग्राम का घरेलू गैस सिलेंडर भी उपलब्ध कराया गया है, जिसकी कीमत लगभग 962 रुपये है। हालांकि, एजेंसी और वितरण शुल्क जोड़ने के बाद यह कीमत 1000 रुपये से अधिक हो जाती है। इसके अलावा, कई बार बुकिंग के बावजूद गैस समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती, जिससे भोजन तैयार करने में बाधा आती है।
स्थिति और जटिल इसलिए भी हो गई है क्योंकि पहले कई स्कूलों में लकड़ी से खाना पकाने की व्यवस्था थी, लेकिन नई स्कूल बिल्डिंग्स में किचन-कम-स्टोर सिस्टम लागू होने के बाद लकड़ी के चूल्हों का उपयोग बंद कर दिया गया है। पुराने आदेशों के तहत कई जगहों पर लकड़ी के चूल्हे हटाकर आधुनिक गैस आधारित व्यवस्था स्थापित की गई है।
हालांकि, सरकार की ओर से पहले यह सुझाव दिया गया था कि आपात स्थिति में मिड-डे मील लकड़ी से भी पकाया जा सकता है, लेकिन मौजूदा ढांचे में यह व्यवहारिक नहीं रह गया है। नए किचन सिस्टम में लकड़ी के चूल्हों की सुविधा उपलब्ध नहीं है, और उन्हें दोबारा स्थापित करना भी आसान नहीं है।
ऐसे में स्कूलों के सामने अब केवल गैस आधारित कुकिंग ही एकमात्र विकल्प बचा है, जो लगातार महंगी और कभी-कभी अनुपलब्ध भी हो जाती है। इससे मिड-डे मील योजना के सुचारु संचालन पर गंभीर असर पड़ रहा है।
शिक्षकों और स्कूल प्रशासन का कहना है कि यदि जल्द ही गैस आपूर्ति और कीमतों को लेकर कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले समय में इस योजना को चलाना और भी मुश्किल हो सकता है। कई जगहों पर इसका सीधा असर बच्चों के पोषण और स्कूल उपस्थिति पर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, बढ़ती लागत और गैस संकट ने मिड-डे मील योजना को एक गंभीर चुनौती में बदल दिया है, जिससे स्कूलों की रोजमर्रा की व्यवस्था प्रभावित हो रही है।





